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ें बैठा था.
"लो, एक चाय उसे भी दे आओ पैसे मत लेना" - मैली-सी धोती और कुर्ते में बाहर् बैठे गँवई की ओर इशारा करते हुये चाय वाले ने अपने नौकर से कहा.
अदरक को पत्थर से कूँचते हुये चायवाले के मन का दर्द साफ झलक रहा था.
मेरी चाय खतम हो गयी थी, मैं निकलने के लिए उठ गया.
"क्या देख रहे हो बाबा?" - गुमटी से बाहर निकलते हुये मैं... |
ालय की चित्रकला प्रदर्शनी में चित्रों का निरीक्षण करते समय अधिकारी एक चित्र के सामने ठहर गये । विद्यालय कक्षा पांच तक का ही था उसमें ऐसा सुधड चित्र देखकर अचंभित थे सभी । चित्र एक रोटी का था जिसे देखकर लगता था एकदम अभी तवे से उतारी गई हो । बनाने वाले लडके को बुलाया गया उससे अधिकारी ने बडे प्यार से पूछा " बेटा ये चित्र आ... |
द में चिपकाये हुए शातिराना मुस्कुराहटों के साथ सभी क़ाग़ज़ भी मानो लहराने लगे !
" भाभी , मैं राजेश पर केस करना चाहती हूँ।"
" क्यों ?क्या हुआ हैं?"
" उसने मुझे धोखा दिया हैं, अपनी पहली पत्नी के लिए मुझे नौकरानी की तरह इस्तेमाल किया हैं।"
" तुम पहले से ही सब जानती थी ?फिर पिता की ओर से अनजाने में हुई उपेक्षा का बदला लेते... |
ीवन दिया है।वह फूट फूट कर रो दिया ।
ममता तो अनमोल होती है भाई ।
तस्वीर ( हसरत )
हामिद जब स्कूल से आया तो उसके चेहरे पर वैसी ही ताजगी थी जैसी मेले से दादी हामिदा के लिए चिमटा लाने पर नुमायां हुई थी . हामिदा ने पूछा - 'क्या हुआ हामिद ? आज तू बड़ा खुश है' .
खुश होने की बात है न दादी, आज मैं स्कूल में फर्स्ट आया . तस्वीर ब... |
ा कर रह गया!
मित्र की तरफ से चित्र सन्देश आया।साथ ही एक चुनौती भी।
"इस चित्र में कमाल ढूँढो।एक चुनौती तुम्हारे लिए।"
चुनौती पढ़ते ही दिमाग की घण्टी बजी और इसे अपनी शान पर ले बैठा। चित्र को बड़ा कर देखने लगा।किसी व्यक्ति द्वारा लिया स्वचित्र (सेल्फ़ी) थी। किसी स्थानीय बस के अंदर का हाल।एक दूसरे में फंसे अटे खड़े स्वार।ग... |
देखना चाहती हैं?" बहू ने रहस्यमयी सवाल किया।
" बस ऐसे ही। दिखा तो।"
बहू ने मंद -मंद मुस्कराते हुए वॉट्सएप पर तस्वीर दिखाते हुए कहा, " मेरी प्यारी ननद रेनू की होने वाली सास बिलकुल गऊ हैं न, मां जी, एकदम आपकी तरह।"
यह सुनकर सुनीता के पति ठठा कर हंसे और बोले, " बहू, तुमने बिलकुल सच कहा। जोड़ी बहुत अच्छी मिल रही है। लेकिन ... |
भी आए थे सेनापति?"
"जी हाँ महाराज! यह वही भारत है, हम इसके चप्पे चप्पे से वाकिफ हैंI"
"लेकिन भारत देश तो बहुत विशाल हुआ करता था, हम किसी गलत जगह तो नहीं आ गए?"
"नहीं नहीं महाराज! हम बिलकुल सही जगह आए हैं, यह देश भारत ही है!"
"हर तरफ खून खराबा, गरीबी और ये भूखी बस्तियाँ, नहीं नहीं! ये तो हरगिज़ भारत की पहचान नहीं थीI"
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पड़ी. मानो कह रहे हो कि बेटा बैंक का कर्ज तो सह लूँगा यह शारीरिक, मानसिक दर्द सहा नहीं जाता है. उन के चहरे पर खींची दर्द की लकीर को उस ने देख लिया था.
कुछ देर दोनों एकदूसरे के दर्द को महसूस करते रहे, " तेरी अमेरिका में इंजीनियरिंग की सर्विस लग गई हैं, बड़ी ख़ुशी हुई, " वे बड़ी मुश्किल से बोल पाए थे. वे कैसे बताते की बे... |
./\.... प्रणाम स्वीकार कीजिएगा .
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बारिश की हल्की हल्की बूंदो के गिरते ही लगा बरसों की परती पडी धरती थरथरा उठी हो। माटी की पोर पोर से भीनी भीनी सुगंध चारों ओर अद्रष्य रुप से व्याप्त हो गयी थी। लॉन से आ रही हरसिंगार, मोगरा, गुड़हल और चमेली की खुषबू को संध्या अपने नथूनों में ही नही महसूस कर रही थी बल्कि अपनी संदीली काया के रोम रोम में सिहरन सा महसूस कर रह... |
की कई हरकतें रीतेश करने लगे अपनी पढाई लिखाई छोड गुमशुम से रहने लगे तो उसके घरवालों ने अपने एकलौते बेटे की खातिर उसके यहां रिश्ता लेकर आये जिसे पहले तो उसकी मॉ ने मना कर दिया। जिसका सबसे बडा कारण रीतेश का उनकी जात का न होना तो था इसके अलावा संध्या की उमर भी बहुत कम होना था। पहले तो उन्होने कहा कि अभी नही पहले बच्ची को ... |
पको।
संध्या विचारों में और गहरे उतर पाती कि बीबी की आवज से वह चौक गयी। घडी की तरफ देखा शाम के पांच बज चुके थे। बीबी 'मॉ' की चाय का वक्त हो चुका था। उसी के लिये आवाज दे रही थी।
संध्या ने जल्दी जल्दी एक कप चाय बीबी के लिये दूध वाली बना कर दे आयी और फिर अपने लिये एक कप बिन दूध की नीबू वाली काली चाय बना के फिर से अपनी खिडक... |
को महसूस करता जो भी मिलता वह बस नहा के अपने आपको तरोताजा करने की नियत से ही पांव पखारने की कोषिश की। खैर अब तो वह किसी की भी परवाह नही करती। परवाह करने का यह मतलब नही, वह किसी को दुख देना चाहती है। हालाकि वह किसी को दुखी कर भी नही सकती। यह उसकी फितरत में ही नही है।
फिलहाल जलजले के बाद उसने अपने जीवन व बच्चों के बारे मे... |
हानी के लेखक को मेल कर ही दिया।
प्रभात जी,
अभी अभी, नेट पर आपकी कहानी 'पहाड़ और नदी' पढी। खाशी भावुक व मन को छू लेनी वाली कहानी लिखी है। किसी पुरुष के द्वारा स्त्री के पक्ष में लिखी यह कहानी अंर्तमन तक हिला गयी। एक अच्छी रचना के लिये आप बधाई के पात्र है।
लेकिन क्या बात है इसके बाद आप की कोई रचना नही आयी।
यदि हो तो वह क... |
े टूट टूट कर रेजा रेजा होकर बिखर जाता है। तब वही पत्थर रेत का ढेर कहलाता है। और जब पूरा का पूरा पहाड़ रेजा रेजा बिखर जाता है, तो वह रेगिस्तान कहलाता है।
उसी रेगिस्तान को कभी गौर से देखा है। जो दिन में आग सा दहकता और रात में बर्फ सा ठंड़ा होता है। जिसके सीने पर मीलों तक सन्नाटा पसरा रहता है, मौत सा गहरा सन्नाटा। जिसमें ... |
और फिर षान से जिंदा ही नही रहते बल्कि अपने अंदर भी मीठा मीठा जीवन रस पैदा करते और संजोते रहते हैं।
यही रस रात भर ऑसू की तरह बहते रहते हैं, चुपके चुपके धीरे धीरे ताकि किसी को एहसास न ही उनकी बीरानी का उनकी तंहाई का। लेकिन जमाने वाले उसे भी हंड़िया में बूंद बूंद भर लेते हैं। और सुबह पीते हैं जिसे ताड़ी कहते हैं। और जानत... |
ो वह गाया करती। दोनो की जोडी अच्छा समां बांधती। दोनेा कबूतर कबूतरी से हर दम गुटर गूं गुटर गूं करते रहते। हालाकि इतने ढेर सारे सुखों के बीच में भी संध्या के दिल में कहीं न कहीं एक खलिष की हल्की हल्की लहर कभी न कभी नदी की तलहटी से उपर आ ही जाती उसे लगता कि क्या यही प्रेम है क्या इसी के लिये लडकियां परेषान रहती है। वह अक्... |
वह उन्हे जितना खुष रखने की कोषिष करती रीतेष उतने ही गुमसुम्म हो जाते और चुप हो जाते पहले तो दो चार दिन में फिर से सामान्य हो जाते पर उनका यह गुमषुम पना अंदर ही अंदर क्या गुल खिला रहा है। जब तक उसे पता लगता लगता तब तक बहुत देर हो चुकी थी। तब तक जीवन का बसंत कब बारिस के मौसम मे बदलता गया जो धीरे धीरे तूफान में बदला अैार ... |
या ने कुछ कहा तो नही। बस रीतेष को अपने पास न फटकने देती।
वह उनके साथ रह के भी न रहती । उनको चुपचाप खाना दे देती। सारा काम कर देती जैसे वह उनकी नौकर हो।
वह बिलकुल टूट चुकी थी पर सास का स्नेह व ससुर का वरदहस्त ही था जो उसे सम्हाले हुआ था। वर्ना फूल की यह डाली तो टूट ही गयी थी।
सोचते सोचते संध्या की आंखें सावन भादों बन बर... |
अपने अपने स्थानों में गये, तबसे तो घर में ही कैद हो के रह गयी है। जहां सिर्फ वह है और मॉ। मॉ का काम धाम करके बस दिन भर साफ सफाई में ही लगे रहना उसका षगल बन गया उसे लगता हर एक चीज मैली है गन्दी जिसे छू कर वह भी गन्दी हो जायेगी। कभी कभी तो उसे भिण्डी जैसी सब्जी में भी किसी पुरुष की उंगलियां नजर आती जो उसे छूना और ड़सना ... |
े बैठ गयी। बाहर गुलमोहर रोज सा अपने आप मे हौले हौले हिल रहा था। काली लम्बी सूनसान सड़क दूर तक पसरी थी जो कभी कदार एक आध मुसाफिर के आवागमन से कुछ देर को गुलजार होती और फिर उसी सन्नाटे मे पसर जाती। संध्या की जिदगी भी तो किसी पॉश कालोनी की दोपहर की सूनसान सडक ही तो है। जहां दिन मे एक दो बार बच्चों के फोन कॉल या फिर मॉ की ... |
पर मॉ बहुत मजबूत कलेजे की थी उसने उसे ढाढस बंधाया और अपने काम काज मे लग गयी। और उसने भी अपने को मॉ की तरह अपने को नौकरी और बच्चों के बीच खपा दिया सुबह से षाम तक सोचने की फुरसत ही न मिलती जिंदगी नौकरी और बच्चों के बीच डोल रही थी।
देव साहब लम्बा चौडा भव्य षानदार व्यक्तित्व कालेज के प्रिसिपल जिन्हे वह पिता तुल्य समझती जिन... |
ठी उधर बाहर सूनी सडक पर धूल का गर्म गुबार उड रहा था जिसके कारण गुलमोहर की पत्तियां और हिल रही थी। और उसका साया भी हिल रहा था।
पता नही यह गुलमोहर का साया था या संध्या के दर्द का साया था ?
सूनसान जंगल मे चुपचाप बहती रही।
जीवन के जंगल मे चुपचाप बहती रही बहती रही। रात बीतती रही दिन गुजरते रहे।
मॉ के पर्वत जैसे व्यक्तित्व औ... |
अपने तरीके से जीने का पूरा अधिकार मिलना चाहिये।
आज दोनो बच्चे अपने अपने परिवार मे खुष हैं प्रसन्न है।
दिन बीते साल बीते मॉ रिटायर हो के उसके पास चली आयी । और जाती भी कहां मॉ का उसके सिवाय और कोई था भी तो नही वही तो इकालौती संतान थी।
मॉ और बेटी दो लोंग बस। घर मे कोई ज्यादा काम होता नही दोनो मॉ बेटी अपने लिये मिल जुल के ... |
कायरा रास्ते पर अपनी स्कूटी दौड़ाए जा रही थी , और उसके पीछे जय के आदमी उसकी सेफ्टी को ध्यान में रखकर , उसके पीछे - पीछे चल रहे थे । एक से दो किलोमीटर चलने के बाद कायरा को महसूस हुआ , कि कोई उसका पीछा कर रहा है । उसने तुरंत पीछे मुड़ कर देखा । लेकिन जय के आदमियों ने कायरा की हरकतों को भांप लिया और कायरा के पीछे मुड़कर द... |
मैम के पीछे ही थे , उन पर नज़र रख रहे थें, पर शायद उनको हम पर शक हो गया । इसी लिए शायद उन्होंने अपनी स्कूटी की स्पीड बढ़ाई और पल भर में हमारी आंखों के सामने से ओझल हो गईं ।
आरव ( शांत भाव से ) - तुम किसी मामूली लड़की का पीछा नहीं कर रहे हो, तुम एक शेरनी का पीछा कर रहे हो । और एक शेरनी की रक्षा करने की जिम्मेदारी मैंने ... |
र के अंदर चली आयी । राजवीर अपने घर में अकेला था । मिस्टर तिवारी कहीं बाहर गए थे और मेघा जी सुबह - सुबह मंदिर गई हुईं थी । राजवीर रात भर से नहीं सोया था और गुस्से से भरा हुआ अपने बिस्तर के किनारे में बैठा , अपनी फोन की स्क्रीन में देख रहा था । कल रात से वो अपने आदमियों के कॉल का वेट कर रहा था , ताकि उसे चंदन की मौत की ख... |
ाका , कि छोटे साहब झूठ कह रहे हैं । ( राजवीर और कायरा की तरफ देखते हुए ) अगर वो मेमसाब इनकी दोस्त होती , तो वे इस तरह नफ़रत भरे स्वर में छोटे साहब को आवाज़ नहीं देती । मुझे तो उन मेमसाब की नज़रों में छोटे साहब के लिए , सिर्फ और सिर्फ गुस्सा और नफ़रत नज़र आ रहा है ।
मोहन ( राजवीर और कायरा की तरफ देखकर ) - मुझे लगता नहीं... |
मेरे सामने मेरे ही घर की छत के नीचे खड़ी हो ....!!!!!
कायरा ( बिना किसी भाव के बोली ) - ये सच्चाई है , कि आज मैं तुम्हारे ही घर में खड़ी हूं ।
राजवीर ( जान बूझकर नासमझ बनते हुए बोला ) - अरे वाह......। मैं तो यही चाहता था , कि कब मैं तुम्हें अपने घर लेकर आऊ और तुम्हें अपने कमरे में सजाकर , अपने घर की शोभा बढ़ाऊं....।
का... |
कुल भी संकोच नहीं करूंगा । चाहे फिर वह कोई भी हो , आरव भी......।
कायरा ( एक झटके से उसका हाथ झटकती है और फिर उससे कहती है ) - आरव के साथ तुम कुछ नहीं कर पाओगे राजवीर , क्योंकि अब मैं तुम्हें उन्हें एक खरोंच भी नहीं पहुंचाने दूंगी ।
राजवीर - इतनी फिकर , वो भी मुझे छोड़ कर आरव के लिए । अच्छा नहीं लगा मुझे ये जानकर कायरा.... |
ाध नहीं होता न, तो अभी तक तुम यहां जमीन पर पड़े हुए अपनी आखिरी सांसें गिन रहे होते ।
राजवीर ( अपने गाल पर हाथ रखकर गुस्से से भरकर कहता है ) - तुमने आरव के लिए , उस इन्सान के लिए मुझपर हाथ उठाया , जो मेरा इस वक्त सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है ।
कायरा ( चिल्लाते हुए ) - हां उठाया मैंने हाथ तुम पर, और वो भी आरव के लिए.... ।... |
ो नुक़सान के लिए कुछ भी किया , तो तुम मेरा वो रूप देखोगे , जो शायद आज तक तुमने किसी भी लड़की का नहीं देखा होगा । अगर मैं किसी की इज्जत और खुशी के लिए तुम्हें तुम्हारे अपराध की सजा देने से खुद को रोक सकती हूं , तो वक्त आने पर आरव को और अपनों को तुम्हारे प्रहार से बचाने के लिए , तुम्हें खुद भी सज़ा दे सकती हूं । इस लिए त... |
ेक्ट कर रही हूं , कि अब तुम मुझे पाने के ख्वाब छोड़ दोगे । क्योंकि इस जनम में तो मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती । मैं सिर्फ आरव की हूं , और उनकी ही रहूंगी । और अगर किस्मत में हम दोनों का मिलना नहीं लिखा है , तो भी मैं ज़िन्दगी भर उनके प्यार के एहसासों में जी लूंगी । लेकिन उनके अलावा न ही मैंने कभी किसी को अपनी ज़िन्दगी ... |
म रहा था । तभी उसके कानों में एक आवाज़ गूंजी।
आवाज़ - जब इतना प्यार करता है उससे , तो कह क्यों नहीं देता उसे, अपने दिल की बात...???
आरव ने आवाज़ सुनकर तुरंत अपनी बगल वाली सीट की और देखा , तो उसे खुद की ही परछाईं नज़र आयी । वह हैरान हो गया , तो परछाईं ने उससे कहा ।
परछाईं - हैरान मत हो आरव , मैं कोई अनजान नहीं , बल्कि त... |
गने लगे हैं, जैसे वो मुझे मेरे भले के लिए ही समझा रही हो ।
परछाईं - इतनी फीलिंग्स हैं तेरे अन्दर , तो एक बार उससे कह दे । उसे भी एहसास हो जाएगा , कि तू उसे कितना चाहता है ।
आरव - फिर वही बात.....!!!! अरे अपनी फीलिंग्स एक्सप्रेस करने से पहले , वो मेरे बारे में क्या सोचती है, ये जानना भी तो जरूरी है । क्या पता , मैं उसे ... |
क्या कायरा आरव के जज्बातों को एक्सेप्ट करती है , या फिर वो एक बार फिर अपने अतीत के कारण आरव को न कह देती है ...????? सवाल बहुत सारे थें, लेकिन जवाब सिर्फ आने वाला वक्त ही दे सकता था । पर हमारे आरव साहब तो इस वक्त खुश थे, और उस गाने को बार - बार सुन रहे थे और मुस्कुराते हुए गुनगुनाए जा रहे थे......।
ज़िन्दगी ....., दो ... |
रोक सकता है? उसे इस जगत की कोई शक्ति नहीं रोक सकती। जिसे अपने अहंकार को गला देने में रस आने लगा, उसे अब कोई नहीं रोक सकता। तुम्हारे अहंकार की पूर्ति में तो हजार लोग बाधाएं डाल सकते हैं, लेकिन तुम्हारे निर-अहंकार की पूर्ति में कोई बाधा नहीं डाल सकता। यह बड़े मजे की बात है!
संसार में कुछ पाना हो तो लोग बाधा डाल सकते हैं,... |
दुख क्या है। क्योंकि दुख तो तुम्हें बहुत मिला है। सुख-दुख दोनों समझ में आ जायें तो महासुख की समझ आ सकती है।
सुख क्या है? एक क्षण भर को अहंकार का मिट जाना सुख है। तुम चौंकोगेः अहंकार का मिट जाना सुख! हां, जब भी तुमने सुख जाना है, सोचना अब, विचारना अब, ध्यान करना उन क्षणों का। जब भी तुमने सुख जाना है, अहंकार मिट गया है; ... |
। रात अंधेरा हो रहा है, सांप हो, बिच्छू हो, जंगली जानवर हों! पहाड़ का मौका। तुम वापिस लौट आये। अहंकार फिर अपनी जगह खड़ा हो गया... शंकित, भयभीत । सुख की जो क्षण भर को झलक मिली थी, खो गई।
ऐसे ही सुख मिलता है। कभी संगीत को सुनते समय... किसी ने वीणा बजाई और तुम तल्लीन हो गये और तुमने कहाः बड़ा सुख मिला! या अपनी प्रेयसी से ... |
हस्य से भरी प्रेम की भाषा में?
या सुख है वह चीज स्पर्श से जिसके मन में कंपन-सा होता, आंखों से
मूक अश्रु ढल कर कपोल पर रुक जाते हैं?
सुख कहां पर वास करता है?
सुख? अरे, यह ज्योतिरिंगन तो नहीं है
जो द्रुमों की पत्तियों की छांह में दिन भर छिपा रहता?
याकि सौरभ पुष्प के उर का?
कि कोई चीज ऐसी जो
हवा में नाचती है रात को नूपुर ... |
उस घड़ी का नाम महासुख है।
सरहपा ने महासुख शब्द का ऐसा ही प्रयोग किया है, जैसे उपनिषद आनंद का करते हैं। लेकिन क्यों सरहपा ने आनंद शब्द का प्रयोग न किया, महासुख का क्यों किया? उसके पीछे भी कारण है। जब आनंद शब्द का हम उपयोग करते हैं तो ऐसा लगता है कि हमारे सुख का और आनंद का कोई संबंध नहीं है। उससे एक भ्रांति पैदा होती है,... |
ी समाधि में विपुल काल तक कलाकार खोया रहता है। वह सब होगा पूर्ण; एक दिन तुम चमकोगे जैसे ये नक्षत्र चमकते हैं अंबर पर ।
बनो संत-से चारु कि जैसे यूनानी थे जो अदृश्य हैं देव उन्हें पूजा सन्मन से। और मर्त्य मनुजों से भी मत आंख चुराओ।
परिभाषा मत पढ़ो; न दो उपदेश किसी को; गुरु से मिले न ज्ञान, भ्रांतियां और सघन हों,
अगर शास्त... |
अहंकार बड़ी बाधा लाता है। अपने ही जैसे मनुष्य के सामने झुकना अहंकार को बड़ा कष्टपूर्ण हो जाता है। तो चले जाओ एकांत में, किसी वृक्ष के पास झुक जाना; उसमें तो उतनी अड़चन नहीं होगी! किसी झरने के पास झुक जाना। चले जाओ एकांत में। घुटने टेक देना पृथ्वी पर। सिर लगा देना पृथ्वी पर । अगर मंदिरों की चौखट पर सिर पटकने में संकोच ल... |
ै, भीतर की आत्मा नहीं है। सुंदर पिंजड़े हैं, पक्षी कभी का उड़ गया है, या कि मर गया है। अब पूजा चल रही है। और लोग बड़ी गुरु-गंभीरता से पूजा कर रहे हैं।
यहां तुम्हें देखकर कठिनाई होगी। अगर समझोगे तो ही समझ पाओगे। अगर थोड़ी संवेदनशीलता होगी तो ही समझ पाओगे। नहीं तो तुम हैरान होकर लौटोगे।
मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे कहते ह... |
ग छुटकारा ही पा लिए हैं। और ईश्वर से छुटकारा हुआ तो उसके साथ-ही-साथ उसके पंडितपुरोहितों से छुटकारा हो गया है, उसके चर्च-मंदिरों से छुटकारा हो गया है। पश्चिम नास्तिक है। नास्तिक का मतलब यह है कि अब परंपरा का, धार्मिक परंपरा का कोई कूड़ा-करकट नहीं है।
यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मुझमें पश्चिम से आनेवाले लोग बड़ी संख... |
िया जा सकता है, चालबाजी की जा सकती है। हालांकि कहानी बिल्कुल साफ है और कहानी में कोई न तो एतराज होने की जरूरत है न छिपाने की कोई जरूरत है। कृष्ण का प्रेम है। अनेकों से हुआ, अड़चन क्या है? परमात्मा प्रकृति के प्रेम में है, इतना ही तो अर्थ हुआ! अगर परमात्मा प्रकृति के प्रेम में नहीं है तो प्रकृति हो ही न। परमात्मा अनंत र... |
ानता हूं, अभी तो आदिष्ट के हिसाब से चल रहा हूं, जब अगले जन्म में कृष्ण होऊंगा, तब तू कुब्जा के नाम से पैदा होगी और जब मैं आऊंगा द्वारिका, तू मेरे मामा कंस के घर दासी होगी, तब तेरा आमंत्रण स्वीकार कर सकूंगा।
सीता तो जग गई। सुन ही रही होगी पड़ी-पड़ी, यह सब हो रहा था जो। और नाराज भी हुई, क्योंकि यह कोई बात हुई! यह तो ऐसे ... |
े हैं कि क्या गहरे अर्थ हैं। मगर दोनों की बात एक संबंध में एक ही है कि कृष्ण को ऐसा नहीं होना चाहिए।
मैं इसलिए उल्लेख कर रहा हूं कि आज देश इतना मर गया है कि यहां आस्तिक और नास्तिक दोनों मुर्दा हैं। जीवन का उल्लास धर्म का सबूत है। और धर्म जब भी होता है तब वह अपूर्व प्रेम की वर्षा अपने साथ लेकर आता है।
मधुमय कंपन ले तन-म... |
ृदय है-- थोड़ा विस्तीर्ण हृदय है। इसलिए तुम आंख खोलकर देख पाए। जो तुमने देखा है, जो तुम देखने के लिए राजी हो सके हो, वह तुम्हारे जीवन को बदलने वाला भी सिद्ध होगा।
जो बसंत को पहचान ले वह बसंत के रंग में रंग जाता है। यहां बंसत आया है। डूबो इसमें! रंग जाओ इसमें! ऐसी घड़ी इतिहास में कभी-कभी होती है। मुर्दा धर्म तो सदा उपलब... |
गली में से लूले कक्का की वैशाखी की आवाज आई तो उन सब की भवें सिकुड़ीं। एक-दूसरे की ओर बड़ी गहरी नजरों से देखा उन सबने।
चम्पा महाराज की नजर में लूले कक्का ऐसे फरेबी हैं कि हरदम ऐब करने का मौका तलाशते रहते हैं। कौये की तरह हरहमेश यही गुनताड़ा लगाते रहेंगे कि कुछ ऐसा-वैसा देखने को मिल जाये। कभी होनहार ऐसी हुई कि उन्हे वैेस... |
्पाप्रसाद के प्रवचन सुनकर लूले कक्का मन ही मन बोले 'मीठा मीठा गप्प और कड़वा थू! तुम तो सहस मुख हो चम्पा प्रसाद, अभी तो वेदों के बहाने से चारों वरन के लिए धर्म-अधर्म की बात कर रहे हो, लेकिन हाल ही कहीं हरिजनों के उद्धार की कोई ऐसी बात सामने आ जाये, जिसमें तुम्हें लाभ पहुंचता हो तो तुम तुरंत ही रामायण में से शबरी और निषा... |
से ज़्यादा शुद्ध चीज और क्या होगी? वैसे ईंधन में शुद्धि अशुद्धि क्या देखना।"
लूले कक्का ने पैंतरा बदला "खेता भैया, तुम्हें शायद पता नहीं है कि गोबर से भी गैस बनती है और दारी इस जीभ को आग लगे भैया कि ये बात भी सोलहा आना सच्ची है कि अब तो आदमी के गू से भी गैस बनने लगी हैं।"
"कक्का तुम भी..." रतना ने घिनाते हुये मुंह बनाय... |
-ठक अब अपने प्रिय क्षेत्र हरिजन टोले की ओर बढ़ने लगी थी, जहाँ बैठे दर्जनों लोग उनका इंतजार कर रहे होंगे।
इधर बड़ी देर तक उनकी वैशाखी की ठक-ठक दालान के एकदम शान्त हो गये वातावरण में गूंजती रही। फिर परिषद के लोग एक-एक करके वहाँ से खिसकने लगे।
संवदिया की भूमिका निभा के लूले कक्का चले गये थे, पर चम्पा प्रसाद तो जैसे अपने त... |
को तगड़ी डांट दिलवाते। आज तो पुरा-पड़ौस और पूरे गाँव में कोई ऐसा बुजुर्ग नहीं बचा है जिससे सलाह लें। जिससे कहेगे, वही जुबान पकड़ लेगा। घर-घर जाके कह देगा कि दुबे महाराज के यहाँ फूटन पड़ गई है बात-बात में छुआ-छूत और जाति-पांति की दुहाई देने वाले चम्पा प्रसाद के निज बड़े भाई को किसी तरह की अपवित्रता का लिहाज नहीं है। हँ... |
रहीं थीं-देखा होगा कि घर में साठ बीघा की जोत है, विरासत में गाँव के डाकघर का काम हैं। हजारों में एक दिखे ऐसा लम्बा-लछारा लड़का हैं। सो राख भये ज्वाला की नीयत डोल गई और मेरे घर को बर्बाद कर डाला। नाश मिट जायेगा ठठरी बंधे का।
अम्माँ चुप हो गईं थीं।
गप्पो खवासन बड़ी सयानी औरत थी। अम्माँ ने चुपचाप उसे बुलवाया। घर की बात घर... |
को बैठ जातीं। कभी घर भर में समय-बेसमय झाड़ू लगाने लगतीं, तो कभी धुले-अनधुले कपड़े उठाके पानी में भिगो देती और कुटनी से कूट-कूट कर उनका मलीदा बना देतीं।
वे दिन बड़ी मुश्किल के दिन थे।
भौजी की बात गाँव में फैलने लगी थी। अम्माँ शर्म संकोच में डूबी हूई घर में बंद रहने लगी थीं। गाँव में कुछ औरतों का कुटनी का ही जन्म होता ह... |
ते रह गये। घर पर आफत टूट पड़ी थी। अम्माँ का धीरज एक बार फिर काम आया। उन्होने तेरही होने के पहले ही कालका प्रसाद को डाकघर का काम संभलवा दिया। डाकखाने के बड़े अफसरों को दरख्वास्त भेजी गयी कि पिता की जगह पुत्र को डाकघर का काम दे दिया जाये। बाद में कालकाप्रसाद के नाम का रुक्का भी आ गया था, तो अम्माँ ने चैन की सांस ली थी। च... |
र जब कोई कतक्यारी अपनी सखी के कान में फुसफुसाती होगी कि 'रात को कुत्ता छू गया सो मेरा तो धरम भिरस्ट हो गया। मैं पूजा कैसे करूं गुइयां' या 'कल मेरे ऊपर कल छिपकली गिर पड़ी जो हर बार चौथ-पांचे को गिरती थी दारी इस दफा परमा को ही आन गिरी, सो आज मैं पूजा नहीं कर पाऊंगी।' साधारण बात है कि "कुत्ता" और "छिपकली" के प्रतीकार्थ का... |
दार बौहरे हो गये थे।
धन और प्रतिष्ठा बढ़ी, तो ब्राह्यण समाज की बिरादरी-पंचायतों में वे पंच बनाये जाने लगे। गाँव की ग्रामीण पंचायतों में भी वे सर्वमान्य पंच बन गये। ज्यों-ज्यों इज्जत मिली, त्यों-त्यों वे छुआछूत और ब्राह्यणी संस्कारों के प्रति ज़्यादा कठोर होते चले गये। इस प्रतिष्ठा और मान-सम्मान ने उनके मन पर ऐसा असर छो... |
ेशान हो उठा। इन्जेक्शन लगेे। बोतलें चढीं। पर अम्माँ बच नहीं पाईं। घर पर अचानक गाज-सी गिर गई. सब लोग बुरी तरह टूट गये।
सबसे ज़्यादा सदमा कालका भैया को लगा। उन पर ऐसा असर हुआ कि वे काम-वासना से एक बार फिर वैरागी से हो गये। उनका ध्यान पूरी तरह से खेती में लगने लगा। एक-एक करके चार कुंये खुदवाये और पूरी जमीन पटवारी की बही म... |
ो हिचकते रहे, फिर एक दिन अस्पताल जाकर कालका भैया ने खुजली की दवा माँगी, तो नर्स चेलम्मा ने बिना किसी लिहाज के अपने हाथों कालका भैया के शरीर पर नीली-सी दवा पोत दी थी। उसके बेलिहाज आचरण, समर्पित सेवाभाव और खुलेपन पर कालका भैया भावाविभूत हो उठे थे।
चम्पा प्रसाद को ठीक से याद है कि कालका भैया तब से रोज ही अस्पताल पहुंचने ल... |
तरह जल ढार के उन्होने सूरज भगवान की ओर मुंह उठाया और लोटे को थोड़ा ऊँचा उठाके तुलसाने में जल धार गिराना शुरु कर दी-ऊँ तापत्राय हरं दिव्यं परमानंद लक्षणम्। तापत्राय विमोक्षायतवार्ध्य कल्पयाभ्यहम्।
अटारी के नीचे वाले मढ़ा में बने पूजा के स्थान पर अगरबत्ती जलाके वे पूजा करने बैठे तो लाख जतन करने से भी ध्यान में मन न लगा।... |
मों को। तुम्हारे कुकर्मों की वजह से आज पूरे खानदान की नाक कट रही है। जिस जात कुजात से रिश्ता बनाके बैठ गये हो, छोड़ो उसे!
कालका भैया यदि चम्पा प्रसाद की बात न समझें तो उन पर रिश्तेदारों का दबाब बनायेंगे। मुन्नी जिज्जी के ससुर को बुला लेंगे, उनसे कहलायेंगे।
न होगा तो मामा को बुला लेंगे। उनका कहना तो मानेंगे कालका प्रसाद... |
ते हैं। नौकरी ही खतरे में होगी तो दोनों की मस्ती क्षण भर में काफूर हो जायेगी।
नर्स को यहाँ से दूर कहीं तबादले पर भी फिकवा सकते हैं वे थोड़े प्रयत्न से, ... और तबादला न हो पाये तो उसके हाथ-पाँव भी तुड़वाये जा सकते हैं। उनके ये इगड़े-बिगड़े चेले कब काम आयेंगे भला! ज़्यादा तीन-पांच करेंगे तो कालका भैया को भी सबक सिखाया जा... |
नाम पर सुखे-पुछे दो जने। रईसी ठाठ होंगे उनके तो।
चम्पा प्रसाद को कालका भैया का जीवन बड़ा सुखी दिखा। उनने मन ही मन अपनी जीवन शैली से कालका भैया की शैली की तुलना की वह एक ईर्ष्या-सी हो आई उन्हें। बस एक पत्नी की ही तो कसर रही ज़िन्दगी में, इस कमी की क्षतिपूर्ति दर्जनों जगह से करते रहे हैं। घाट-घाट का पानी पिया है कालका भ... |
र से उठ रहा बवंडर कुछ ज़्यादा ही तेज हो चला है।
प्रतिकूल और आपदाग्रस्त स्थितियों में सदा से चम्पाप्रसाद का मस्तिष्क कुछ तेज ही चलता रहा है। वे अपनी बिरादरी में चतुर दिमाग के माने जाते हैं। खुद की विलक्षण और शरारती क्षमताओं पर उन्हें भी खूब गर्व है। गहरी नींद में भी उन्हें अहसास रहता है कि वे समाज की सर्वोच्च बिरादरी मे... |
ा अवधारणा जम जाती हैं। गाँव में लूले कक्का और उनके सहयोगी लोग अब तक जो धूर्त, चालाक और गुरु घंटाल की उपाधियाँ देती रहे वे शायद सच्ची थीं। उन्हें ताज्जुब था कि इन उपाधियों को याद करके उन्हें ज़रा भी लज्जा और हीन भावना अनुभव नहीं हो रही है-बल्कि गर्व-सा लग रहा है।
वे चैतन्य हो गये। मन ही मन उन्होंने एक निर्णय लिया कि उनन... |
को "दक्षिणी विवाह पद्धति" से सम्पन्न करा देंगे। मलयाली स्त्रियाँ इस अवसर पर कितनी भलीं लगेंगी जब वे एक स्वर होके मलयानी में ब्याहगीत गायेंगी।
विवाह करने के निर्णय के साथ ही उनके मन का सारा द्वंद्व धूल के अंधड़ की तरह एकाएक मंदा पड़ता हुआ शांत हो गया-चलो जायदाद बची रह गई तो जाति और समाज भी सम्मान देगा।
अपने इष्ट देव के... |
पैदा हुई तो दोनों बराबर खेला करते और इसी से इन दोनों की आपस की मुहब्बत भी बढ़ गई। उस वक्त यह भी नहीं मालूम होता था कि आप और राजा सुरेंद्रसिंह कोई दो हैं या नौगढ़ या विजयगढ़ दो रजवाड़े हैं। सुरेंद्रसिंह् भी बराबर आप ही के कहे मुताबिक चला करते थे। कई बार आप कह भी चुके थे कि चंद्रकांता की शादी वीरेंद्र के साथ कर देनी चाहि... |
ूरसिंह के हवाले किया ।
अभी ये लोग बैठे ही थे कि एक चोबदार ने आ कर अर्ज किया - 'महाराज ड्योढ़ी पर कई आदमी फरियादी खड़े हैं, कहते हैं हम लोग क्रुरसिंह के रिश्तेदार हैं, इनके चुनारगढ़ जाने का हाल सुन कर महाराज जयसिंह ने घर-बार लूट लिया और हम लोगों को निकाल दिया। उन लोगों के लिए क्या हुक्म है?'
यह सुन कर क्रूरसिंह के होश उ... |
ी भी जानते थे। अब यह शैतान का झुंड विजयगढ़ की तरफ रवाना हुआ । इन लोगों का इरादा नौगढ़ जाने का भी था । देखिए कहाँ जाते हैं और क्या करते हैं?
वीरेंद्रसिंह् और तेजसिंह नौगढ़ के किले के बाहर निकल बहुत से आदमियों को साथ लिए चंद्रप्रभा नदी के किनारे बैठ शोभा देख रहे थे । एक तरफ से चंद्रप्रभा दूसरी तरफ से करमनाशा नदी बहती हुई... |
सूँघिएगा और इस बात का भी ख्याल रखिएगा कि मेरी सूरत बना के भी वे लोग आएँ तो ताज्जुब नहीं। इस तरह आप मुझको पहचान लीजिएगा, देखिए मेरी आँख के अंदर, नीचे की तरफ यह एक तिल है जिसको कोई नहीं जानता। आज से ले कर दिन में चाहे जितनी बार जब भी मैं आपके पास आया करूँगा इस तिल को छिपे तौर से दिखला कर अपना परिचय आपको दिया करूँगा । अग... |
्रूर चुनारगढ़ गया है। अब वहाँ का हाल सुनो, चार ऐयार और एक पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी को महाराज शिवदत्त ने मदद के लिए उसके संग कर दिया है और वे लोग यहाँ पहुँच गए हैं। उनकी मंडली अब भारी हो गई और इधर हम तुम दो ही हैं, इसलिए अब हम दोनों को बड़ी होशियारी करनी पड़ेगी। वे ऐयार लोग महाराज जयसिंह को भी पकड़ ले जाएँ तो ताज्जुब नहीं... |
े सब दोस्त जो बेहोश पड़े थे वह भी होश में आए मगर अपनी हालत देख-देख हैरान थे । लोगों ने पूछा - 'आप लोग कैसे बेहोश हो गए और दीवान साहब कहाँ हैं?'
उन्होंने कहा - 'एक गंधी इत्र बेचने आया था जिसका इत्र सूँघते-सूँघते हम लोग बेहोश हो गए, अपनी खबर न रही। क्या जाने दीवान साहब कहाँ हैं? इसी से कहते हैं कि अमीरों की दोस्ती में हम... |
थे । उन्हीं के मामूल के मुताबिक वह भी दरबार में दीवान की जगह बैठ काम करने लगे, थोड़ी देर में महाराज भी आ गए।
दरबार में मौका पा कर हरदयालसिंह धीरे-धीरे अर्ज करने लगे - 'महाराजाधिराज, ताबेदार को पक्की खबर मिली है कि चुनारगढ़ के राजा शिवदत्तसिंह ने रसिंह की मदद की है और पाँच ऐयार साथ करके सरकार से बेअदबी करने के लिए इधर र... |
लसिंह की बात सुन के थोड़ी देर महाराज गौर करते रहे फिर बोले - 'तुम्हारा कहना ठीक है, सुरेंद्रसिंह और उनका लड़का वीरेंद्रसिंह दोनों बड़े लायक है। इसमें कुछ शक नहीं कि वीरेंद्रसिंह वीर है और राजनीति भी अच्छी तरह जानता है, हजार सेना ले कर दस हजार से लड़ने वाला है और तेजसिंह की चालाकी में भी कोई फर्क नहीं, जैसा तुम कहते हो ... |
घूमती हुईं इन पहाड़ों पर बहती हैं। जाबूजा खोह और दर्रे पहाड़ों में बड़े खूबसूरत कुदरती बने हुए हैं। पेड़ों में साखू, तेंद,
विजयसार, सनई, कोरया, गो, खाजा, पेयार, जिगना, आसन आदि के पेड़ हैं। इसके अलावा पारिजात के पेड़ भी हैं । मील-भर इधर-उधर जाइए तो घने जंगल में फँस जाइएगा। कहीं रास्ता न मालूम होगा कि कहाँ से आए और किधर ... |
'अच्छी हैं, सिवाय आपकी याद के और किसी तरह की तकलीफ नहीं है, हमेशा कह करती हैं कि बड़े बेमुरव्वत हैं, कभी खबर भी नहीं लेते कि जीती है या मर गई । आज घबरा कर मुझको भेजा है और यह दो नाशपातियाँ अपने हाथ से छील-काट कर आपके वास्ते भेजी हैं तथा अपने सिर की कसम दी है कि इन्हें जरूर खाइएगा।'
वीरेंद्रसिंह चपला की बातें सुन बहुत ... |
ह ने जबर्दस्ती उसके नाक में दवा ढूँस बेहोश किया और गठरी में बाँध किनारे रख बातें करने लगे।
तेजसिंह ने कुमार को समझाया और कहा - 'देखिए, जो हो गया सो हो गया, मगर अब धोखा मत खाइएगा ।'
कुमार बहुत शर्मिंदा थे, इसका कुछ जवाब न दे विजयगढ़ का हाल पूछने लगे। तेजसिंह ने सब खुलासा ब्यौरा कहा और चिट्ठी भी दिखाई जो महाराज जयसिंह ने... |
ंदुओं को रखिए, दूसरे यह कि कुँवर वीरेंद्रसिंह का हमेशा ध्यान रखिए और महाराज से बराबर उनकी तारीफ कीजिए जिससे महाराज मदद के वास्ते उनको भी बुलाएँ ।'
हरदयालसिंह ने कसम खा कर कहा - 'मैं हमेशा तुम लोगों का खैर, ख्वाह हूँ, जो कुछ तुमने कहा है उससे ज्यादा कर दिखाऊँगा।'
तेजसिंह ने ऐयारी की गठरी खोली और एक खुलासा बेड़ी उसके पैर... |
हें बुला लें मुझे कुछ हर्ज नहीं, तेजसिंह आपके साथ जाएगा।' यह कह अपने वजीर जीतसिंह को हरदयालसिंह की मेहमानदारी का हुक्म दिया और दरबार बर्खास्त किया ।
दीवान हरदयालसिंह की मेहमानदारी तीन दिन तक बहुत अच्छी तरह से की गई जिससे वे बहुत खुश हुए। चौथे दिन दीवान साहब ने राजा से रुखसत माँगी, राजा बहुत कुछ दौलत जवाहरात से उनकी विद... |
चौबीसवां प्रवचन आज लहरों में निमंत्रण
पहला प्रश्नः जैन मानते हैं कि जिन-शासन के अतिरिक्त सभी शासन मिथ्या हैं, इसलिए दूसरे शासन में नहीं जाना चाहिए। जाग्रत व सिद्ध पुरुषों के बाबत बताए जाने पर भी वे उनकी ओर उन्मुख नहीं होते। क्या उन्हें सन्मार्ग पर लाना संभव नहीं है?
पहली बातः मानते तो ठीक ही हैं वे, कि जिन-शासन के अतिर... |
षों को मानने में सुविधा होती है। वे तुम्हें बदल नहीं सकते। उनके साथ कोई जोखिम नहीं है--मरे महावीर क्या करेंगे तुम्हारा ? जा चुके महावीर क्या करेंगे तुम्हारा ? जहां बिठाओगे वहां बैठेंगे, जहां उठाओगे वहां उठेंगे। जो पूजा लगा दोगे वही स्वीकार करेंगे। न लगाओगे तो बैठे रहेंगे। भूखे बैठे रहेंगे। फूल न चढ़ाओगे तो क्या करेंगे?... |
े सकते हो? वह वृक्ष न रहा। अगर आज तुम्हें भरी दुपहरी में सिर से पसीना बहने लगता है तो तुम छाया खोजते हो किसी वृक्ष की, जो है; तुम उस वृक्ष की छाया में नहीं बैठते जो कभी था। पागल होओगे तुम अगर उस वृक्ष की छाया में बैठोगे । न वृक्ष है, न छाया है। धूप से जलोगे। अगर प्यास लगती है तो तुम उस सरोवर के पास जाते हो, जो अभी है। ... |
ुझे कुछ पूछना है।
भिक्षुओं ने कहा, बड़ी देर लगाई। तीस साल तुम्हारे गांव से गुजरे। और अनेक बार हम तक ऐसी खबर भी आयी कि तुम आना चाहते हो लेकिन तुम कभी आए नहीं।
उसने कहा, करूं क्या, कभी मेहमान आ गए, कभी पत्नी बीमार पड़ गई। कभी दुकान पर ग्राहक ज्यादा थे। कभी आया भी था तो रास्ते में कोई मित्र मिल गया कई वर्षों का, तो फिर घर... |
जहां सुबह होती दिखाई पड़े, जहां सूरज ऊगता दिखाई पड़े, वहां झुक जाना; उस शासन को स्वीकार कर लेना।
तो बात तो ठीक ही है। मैं यह नहीं कह रहा हूं लेकिन कि जो उसको मानते हैं वे ठीक हैं। बात तो ठीक है, बात को माननेवाले गलत हैं। कहते तो हैं, जिन-शासन एकमात्र सत्य है और बाकी सब मिथ्या। लेकिन मानते शास्त्र को हैं, जिन को थोड़े ... |
पैदा हुआ, अनेकांतवाद पैदा हुआ । महावीर ने कहा है कि जो-जो भी तुम्हें बिल्कुल भी गलत लगता हो, उसकी दृष्टि में भी खोजोगे तो कुछ न कुछ
तो अंश पाओगे सत्य का। पूर्ण चाहे सत्य न हो, पूर्ण असत्य भी नहीं हो सकता। और महावीर ने तो कहा है, पूर्ण सत्य को कहने का कोई उपाय ही नहीं है।
इसलिए दो बातेंः जितनी दृष्टियां हैं, सभी अंश सत्... |
ुम जो भी वर्णन करोगे, तुम पाओगे बहुत कुछ शेष रह गया है, जो नहीं कहा जा सकता। तुम लाख रंगों का वर्णन करो, सुननेवाले पर तुम वही प्रभाव थोड़े ही पैदा कर पाओगे, जो तुम पर पैदा हुआ था सुबह के सूरज को ऊगते देखकर। तुम बड़े से बड़े कवि होओ, तो भी तुम पाओगे, हाथ कंपते हैं, बड़े से बड़े कवि को भी लगता है कि हम सिर्फ तुतलाते हैं।... |
मौजूद थे, पूरे दरबारी मौजूद थे, फांसी का तख्ता मौजूद था, जल्लाद मौजूद थे। और मुल्ला अपने गधे पर सवार दरवाजे के भीतर प्रविष्ट हुआ।
सम्राट ने कहा, "कहां जा रहे हो नसरुद्दीन?"
नसरुद्दीन ने कहा, "फांसी के तख्ते पर लटकने जा रहा हूं।"
अब बड़ी मुश्किल हो गई। अगर उसको लटकाओ तो वह सच हो जाए। अगर न लटकाओ तो वह झूठ है । अब करो क... |
कुछ कहे तो तुम उसमें दीये की टिमटिमाती रोशनी भी देखना । वही देखना। जितना सत्य का अंश है उतना देख लेना। तुम्हें असत्य से लेना-देना क्या है? हंसा तो मोती चुगे। तुम अपने मोती-मोती चुन लेना, कंकड़ छोड़ देना।
लेकिन तुम कंकड़ों ही कंकड़ों पर चोंच मारते हो। तुम मोती चुनने में उत्सुक नहीं हो। तुम तो यही सिद्ध करने में उत्सुक ... |
खोजो, जिसके पास तुम्हारी आंखें आकाश की तरफ उठने लगें; जिसकी अभीप्सा तुम्हें भी संक्रामक रूप से पकड़ ले; जिसके बवंडर में तुम भी थोड़े उड़ने लगो।
जाग्रत व सिद्ध पुरुषों के बाबत बताए जाने पर भी वे उनकी ओर उन्मुख नहीं होते। "
दुनिया में सबसे कठिन बात वही हैः जाग्रत पुरुषों की तरफ उन्मुख होना । उसका मतलब है, अपने से विमुख ... |
ुनिया रही ही नहीं है। महावीर क्या मरे, सब मर गया। महावीर क्या गए, सब गया। सब संभावना, सत्य को पाने की सारी सुविधा, सब चली गई।
यह भी कोई बात हुई ? यह तो बड़ी खतरनाक धारणा हुई। इस धारणा का अर्थ तो बड़ी हताशा होगा। तब हमारे हाथ में कुल इतना ही है कि हम महावीरों की स्तुति करते रहें, स्वयं महावीर न बनें।
इसलिए तुम जब उन्हें... |
भोल्दाविया - निवासियों का दल, जिनके साथ में अंगूर तोड़ने का काम करता था, समुद्र तट की ओर घूमने चल दिया । मैं और एक बूढ़ी स्त्री, जिसका नाम इजरगिल था, रह गए । वह अंगूर की बेलों की घनी छांव में चुपचाप लेटी थी और समुद्र तट की ओर जाते हुए लोगों की छायाकृतियों को रात की नीली परछाइयों में विलय होते देख रही थी ।
वे गाते और हं... |
अन्तहीन मैदानों के - गर्भ में से प्रकट हुआ जिसमें जाने कितना मानवीय रक्त और मांस समाया है और जो शायद इसीलिए इतने सम्पन्न और उपजाऊ है । बूढ़ी स्त्री और मैं पत्तों की बेलबूटेनुमा परछाइयों के जाल में घिरे थे । स्तेपी के ऊपर, जो हमारी बाईं ओर दूर तक फैली थी, बादलों की परछाइयां दौड़ रही थीं जिन्हें चांद की नीली चान्दनी ने ... |
र बहुत दूर - जहां सूरज निकलता है - एक देश है, जिसमें एक बहुत बड़ी नदी बहती है, और इस देश में प्रत्येक पत्ता और घास का प्रत्येक फलका इतनी
घनी छांव देता है कि उसमें बैठकर आदमी सूरज से अपना बचाव कर सकता है - उस सूरज से, जो पूरी बेरहमी से वहां आग बरसाता है । "देखा तुमने, उस देश की धरती इतनी उपजाऊ ļ
" उस देश में कभी एक शक्त... |
साथ इसके रहने की कोई गुंजायश नहीं है। जहां इसके सींग समाएं, चला जाए ।
वह हंसा और जहां उसके सींग समाए, चला गया - वह एक सुन्दर लड़की के पास पहुंचा जो बड़े ध्यान से उसका निरीक्षण कर रही थी। उसने उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया । वह उसे दुतकारनेवाले उन बड़े बूढ़ों में से ही एक की लड़की थी । हालांकि वह बहुत खूबसूरत था, लेकिन... |
लगे, गोल चांद चांद, जो पहले खूनी-लाल था, धरती से ऊंचा उठता हुआ अब अधिक उजला हो गया था और स्तेपी के समूचे ओर-छोर में उदारता के साथ अपनी नीली रौशनी बिखेर रहा था ।
" और तब बड़े बूढ़े यह निश्चय करने के लिए जमा हुए कि इतने बड़े अपराध के लिए कौनसी सज़ा माकूल होगी। पहले तो उन्होंने सोचा कि घोड़ों से उसकी बोटी-बोटी रौंदवाई जा... |
ास न तो अपनी कोई जाति थी, न मां थी, न ढोर-डंगर थे, न पत्नी थी, न ही इन चीज़ों में से किसीसे वह कोई वास्ता रखना से चाहता था ।
" और, यह सब जानने के बाद उन्होंने फिर विचार किया कि उसके लिए कौनसी सज़ा उपयुक्त हो सकती है। लेकिन उन्हें ज्यादा देर बातचीत नहीं करनी पड़ी कि उसी बुद्धिमान आदमी ने, जो बातचीत में कोई हिस्सा न लेते... |
अर्से तक - बहुत बहुत दिनों तक - वह मानवीय बस्तियों के छोरों पर ही मंडराता रहा, - अकेला और एकाकी । उसके बाद, एक दिन वह एक बस्ती के निकट रेंग आया, और जब लोग उसपर आक्रमण करने के लिए लपके तो वह अपनी जगह से नहीं हिला, वहीं खड़ा रहा, और अपने बचाव के लिए भी उसने कोई प्रयत्न नहीं किया - ज़रा सा भी प्रयत्न नहीं किया । तभी एक आ... |
ानो उसमें भय और दासता का पुट मिला हो ।
समुद्र तट पर लोग गा रहे थे और आज वे कुछ असाधारण ढंग से गा रहे थे। महीन स्त्री- कंठ ने इस राग को छेड़ा और दो या तीन कड़ियों के बाद एक दूसरी आवाज़ ने उसे फिर शुरू से उठाया, जब कि पहले वाली आवाज़ अगली कड़ियों पर पहुंच गयी। इसी प्रकार तीसरी, चौथी और पांचवीं आवाज़ ने उसे उठाया और फिर, ... |
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